Vvan Review: छठ बिहार के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था परिवार और अपनी मिट्टी से जुड़ने का एक खास मौका है। यही वजह है कि जब किसी फिल्म में छठ बिहार और लोक आस्था को कहानी का हिस्सा बनाया जाता है, तो बिहार के दर्शकों की उम्मीद अपने आप बढ़ जाती है। Vvan को लेकर भी कुछ ऐसी ही उम्मीद थी। Arunabh Kumar और Deepak Mishra जैसे नाम जुड़े होने की वजह से लगा कि इस बार बिहार को पुराने फिल्मी stereotypes से अलग तरीके से दिखाया जाएगा। लेकिन फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है कि आखिर Vvan में किस बिहार को दिखाने की कोशिश की गई है?
Vvan Review छठ को समझा नहीं सिर्फ कैमरे में उतार दिया
Vvan की सबसे बड़ी परेशानी सिर्फ इसकी कहानी नहीं है। असली समस्या यह लगती है कि जिस छठ और लोक आस्था को फिल्म की पहचान बनाने की कोशिश की गई है, उसकी गहराई तक फिल्म पहुंच नहीं पाती।
बिहार में छठ सिर्फ घाट पूजा प्रसाद और सूर्य को अर्घ्य देने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे परिवार व्रत, विश्वास, परंपरा और भावनाओं की लंबी कहानी होती है। बिहार से बाहर रहने वाले लोग भी कई बार छठ के समय अपनी मिट्टी और परिवार के पास लौटने की कोशिश करते हैं। फिल्म में छठ दिखाई देता है, लेकिन कई जगह उसकी भावना उतनी मजबूत महसूस नहीं होती। छठ को दिखाना और छठ को महसूस कराना दो अलग चीजें हैं।
Vvan में बिहार असली कम फिल्मी ज्यादा लगता है
Vvan के कई हिस्सों को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म सेट पर बिहार का माहौल तैयार किया गया हो। घाट कपड़े, संवाद और लोक संस्कृति के कुछ elements जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन बिहार की असली पहचान सिर्फ इन चीजों से नहीं बनती। बिहार की अपनी भाषा है, अपनी body language है, घरों का अपना माहौल है और रिश्तों को देखने का अपना तरीका है। ऐसी छोटी-छोटी चीजें किसी कहानी को authentic बनाती हैं। यहीं Vvan कई जगह कमजोर पड़ती नजर आती है।
फिल्म में बिहार को दिखाने की कोशिश जरूर दिखाई देती है, लेकिन उसे समझने और उसकी छोटी-बड़ी बारीकियों को कहानी में शामिल करने की कोशिश उतनी मजबूत नहीं लगती। एक बिहारी दर्शक इन चीजों को जल्दी पकड़ सकता है।
Arunabh Kumar से उम्मीद ज्यादा क्यों थी?
Arunabh Kumar का नाम सामने आने के बाद Vvan को लेकर उम्मीद इसलिए भी बनी क्योंकि TVF से जुड़ी कई कहानियों में छोटे शहरों और आम लोगों की जिंदगी को relatively natural तरीके से दिखाने की कोशिश देखने को मिली है। इसी वजह से लगा था कि Vvan में भी बिहार को सिर्फ एक background की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
लेकिन फिल्म देखने के बाद कई जगह ऐसा महसूस होता है कि बिहार कहानी के अंदर मौजूद होने के बावजूद किरदारों के व्यवहार और उनकी सोच में उतनी मजबूती से दिखाई नहीं देता। किरदारों के पीछे बिहार नजर आता है, लेकिन किरदारों के भीतर बिहार कम महसूस होता है। यही बात फिल्म के असर को कमजोर करती है।
बिहारी दर्शक को सिर्फ stereotype नहीं चाहिए
बॉलीवुड और दूसरी फिल्मों में बिहार को लंबे समय तक कुछ तय stereotypes के जरिए दिखाया जाता रहा है। देसी भाषा गरीबी दबंग किरदार मजाकिया बिहारी character या गांव कस्बे की एक खास image। समस्या तब होती है जब किसी फिल्म को लगता है कि कुछ बाहरी symbols जोड़कर पूरा regional culture दिखाया जा सकता है।
बिहार के दर्शक अपने culture को जानते हैं। उन्हें पता है कि उनकी भाषा कैसी है, उनके त्योहारों का महत्व क्या है और उनके समाज में रिश्तों की भूमिका कितनी बड़ी है। इसलिए सिर्फ कुछ familiar चीजें दिखा देने से audience emotionally connect नहीं करती। Vvan में भी यही gap कई जगह महसूस होता है।
छठ कोई Production Design नहीं है
छठ को फिल्म में दिखाना आसान है। घाट का बड़ा shot लिया जा सकता है। सूर्य को अर्घ्य देते लोगों को दिखाया जा सकता है। पूजा का माहौल बनाया जा सकता है और background में लोकगीत इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इससे छठ की असली भावना स्क्रीन पर नहीं आती।
छठ उस परिवार की भावनाओं में है जो कई दिनों तक इसकी तैयारी करता है। उस व्रती के अनुशासन में है जो पूरे विश्वास के साथ पूजा करता है। उस परिवार की चिंता में है जो घाट तक साथ चलता है। और उस व्यक्ति की भावनाओं में भी है जो दूसरे शहर या देश में रहने के बावजूद छठ के समय अपने घर और परिवार को याद करता है। यही emotional layer किसी फिल्म को authentic बना सकती थी। Vvan कई जगह इस surface से आगे नहीं बढ़ पाती।
वन देवी की कहानी भी पूरी तरह असर नहीं छोड़ती
Vvan में वन देवी और लोककथा से जुड़ा हिस्सा कहानी में mystery और लोकविश्वास जोड़ने की कोशिश करता है। लेकिन यहां भी execution हर जगह उतना प्रभावी नहीं लगता। कुछ scenes में narration और voice-over का इस्तेमाल ऐसा लगता है कि जिस रहस्य और गहराई को पैदा करना था, वह पूरी तरह बन नहीं पाता।
लोककथा को सिर्फ narration के जरिए बताना काफी नहीं होता। उसके लिए कहानी की भाषा वातावरण character और विश्वास सभी को एक साथ काम करना पड़ता है। अगर दर्शक उस लोकविश्वास को महसूस नहीं कर पाता तो कहानी का supernatural या mythological हिस्सा भी उतना असरदार नहीं बनता।
Vvan को हिंदी की Kantara कहना कितना सही
Vvan को लेकर हिंदी की Kantara जैसी तुलना की चर्चा ने naturally expectations बढ़ा दीं। लेकिन किसी फिल्म में folklore होना और उस folklore के साथ गहरा connection होना अलग बातें हैं। Kantara की चर्चा में अक्सर उसकी local culture, folklore और जमीन से जुड़े presentation को उसकी पहचान का हिस्सा माना गया। Vvan में भी लोक आस्था और संस्कृति मौजूद है, लेकिन दोनों फिल्मों के cultural treatment को सीधे एक जैसा मानना आसान नहीं है।
Vvan में folklore है, लेकिन कई जगह वह कहानी का natural हिस्सा कम और cinematic element ज्यादा महसूस होता है। यहीं से comparison कमजोर पड़ जाता है।
क्या फिल्म को Edit Table पर इन सवालों पर दोबारा सोचना चाहिए था?
फिल्म बनने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण काम सिर्फ शूटिंग नहीं होता। Edit table पर कहानी की pacing, scenes की जरूरत और पूरी फिल्म का emotional impact सामने आता है। Vvan को देखने के बाद सवाल उठता है कि क्या final edit से पहले यह पर्याप्त रूप से जांचा गया कि बिहार और छठ का presentation स्थानीय दर्शकों को कितना authentic लगेगा?
क्या यह देखा गया कि कहीं छठ सिर्फ visual element बनकर तो नहीं रह गया या फिर यह मान लिया गया कि घाट पूजा और लोककथा को एक साथ दिखाने से बिहार अपने आप स्क्रीन पर आ जाएगा यही सवाल फिल्म देखने के बाद काफी देर तक दिमाग में रहता है।
बिहार को दिखाना और बिहार को समझना अलग है
Vvan की सबसे बड़ी कमजोरी शायद यही है। फिल्म में बिहार दिखाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। लेकिन बिहार को समझने की कोशिश हर scene में उतनी मजबूत महसूस नहीं होती। Regional cinema या किसी regional culture पर आधारित कहानी में authenticity सिर्फ location और costume से नहीं आती। वह dialogue, behavior, emotions और छोटे details से बनती है।
बिहारी दर्शक जब बिहार को स्क्रीन पर देखता है, तो वह सिर्फ यह नहीं देखता कि घाट सही दिख रहा है या नहीं। वह यह भी देखता है कि लोग वैसे behave कर रहे हैं या नहीं जैसे उसके आसपास के लोग करते हैं। Vvan इसी जगह पर कई सवाल छोड़ देती है।
एक बिहारी दर्शक के तौर पर Vvan क्यों निराश करती है
Vvan से निराशा सिर्फ इसलिए नहीं होती कि फिल्म हर जगह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करती। निराशा इसलिए भी होती है क्योंकि फिल्म के पास एक ऐसा मौका था जहां बिहार और छठ को ज्यादा genuine तरीके से दिखाया जा सकता था।
बिहार को लंबे समय से फिल्मों में stereotypes के जरिए देखने की आदत रही है। इसलिए जब कोई कहानी छठ और लोक आस्था जैसे विषय को केंद्र में लाती है, तो उम्मीद होती है कि इस बार culture को सिर्फ visual backdrop नहीं बनाया जाएगा। लेकिन Vvan कई जगह उसी surface-level treatment में फंसती हुई दिखाई देती है।
एक बिहारी दर्शक के लिए छठ कोई content hook नहीं है। यह उसकी family, culture और identity से जुड़ा हिस्सा है। इसीलिए जब फिल्म उस भावना को पूरी तरह पकड़ नहीं पाती तो निराशा स्वाभाविक लगती है।
Final Verdict
Vvan में बिहार, छठ और लोक आस्था जैसे मजबूत elements मौजूद हैं। फिल्म के पास एक ऐसी कहानी बनाने का मौका था जो बिहार की culture और emotional depth को ज्यादा authentic तरीके से सामने ला सकती थी। लेकिन कई जगह फिल्म बिहार की आत्मा को समझने के बजाय उसके visual elements पर ज्यादा निर्भर दिखाई देती है।
घाट दिखा देने से बिहार नहीं बनता। छठ दिखा देने से उसकी पूरी आस्था स्क्रीन पर नहीं आती। और सिर्फ folklore को कहानी में जोड़ देने से किसी फिल्म की तुलना अपने आप बड़े लोककथा आधारित सिनेमा से नहीं की जा सकती। एक बिहारी दर्शक के तौर पर Vvan से उम्मीद काफी थी। लेकिन फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है आखिर यह कौन सा बिहार दिखाया गया है?
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