Governor Movie Review: भारत के आर्थिक संकट की अनकही कहानी को पर्दे पर लाती है यह फिल्म

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Governor Movie Review: भारतीय सिनेमा में अक्सर सैनिकों, खिलाड़ियों और राजनीतिक नेताओं की कहानियां देखने को मिलती हैं, लेकिन देश की आर्थिक दिशा बदलने वाले लोगों की कहानियां कम ही सामने आती हैं। इसी कड़ी में आई फिल्म Governor: The Silent Savior एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहती है, जिसने देश को आर्थिक संकट से उबारने में अहम भूमिका निभाई थी। यह फिल्म पूर्व आरबीआई गवर्नर एस. वेंकिटारमनन के जीवन से प्रेरित है और 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है। हालांकि विषय बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन फिल्म अपने स्क्रीनप्ले और प्रस्तुति में कुछ जगहों पर कमजोर भी नजर आती है।

Governor Movie Review

भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे कठिन दौर को केंद्र में रखकर बनाई गई फिल्म Governor: The Silent Savior दर्शकों को उस समय में ले जाती है जब देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका था। फिल्म दिखाती है कि किस तरह सीमित संसाधनों और भारी दबाव के बीच एक टीम ने ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। मनोज बाजपेयी ने मुख्य भूमिका में शानदार अभिनय किया है और अपने किरदार को पूरी गंभीरता के साथ निभाया है। हालांकि फिल्म का विषय बेहद प्रभावशाली है, लेकिन इसकी कहानी कई महत्वपूर्ण राजनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं को नजरअंदाज करती दिखती है। यही वजह है कि यह फिल्म एक मजबूत और यादगार प्रस्तुति बनने के बजाय एक अच्छी लेकिन अधूरी कोशिश बनकर रह जाती है।

फिल्म की कहानी

फिल्म की शुरुआत वर्ष 2022 से होती है, जब श्रीलंका के आर्थिक संकट की खबरें टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही होती हैं। इसी दौरान एक महिला 1990-91 के उस दौर का जिक्र करती है, जब भारत भी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। कहानी फ्लैशबैक में पहुंचती है, जहां खाड़ी युद्ध, बढ़ती महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार ने देश को मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया था। ऐसे समय में ए. रमन (मनोज बाजपेयी) को राष्ट्रीय बैंक ऑफ इंडिया का नया गवर्नर बनाया जाता है। इसके बाद फिल्म दिखाती है कि कैसे वह और उनकी टीम देश को आर्थिक तबाही से बचाने के लिए कई साहसिक और जोखिम भरे फैसले लेते हैं।

फिल्म की खूबियां

महत्वपूर्ण विषय का चयन

फिल्म भारत के आर्थिक इतिहास के एक ऐसे अध्याय को सामने लाती है, जिसके बारे में आम लोग बहुत कम जानते हैं। यह इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

मनोज बाजपेयी का दमदार अभिनय

मनोज बाजपेयी ने अपने किरदार में पूरी तरह खुद को ढाल लिया है। उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद अदायगी और भावनात्मक अभिव्यक्ति फिल्म को मजबूती देती है।

90 के दशक का प्रभावी चित्रण

सिनेमेटोग्राफी के जरिए 1990 के दशक का माहौल अच्छी तरह दिखाया गया है। उस दौर की परिस्थितियों को यथार्थवादी अंदाज में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है।

संवाद और संगीत

फिल्म के संवाद कई जगह प्रभाव छोड़ते हैं और कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। संगीत भी विषय के अनुरूप है और अनावश्यक रूप से कहानी पर हावी नहीं होता।

फिल्म की खामियां

निष्पक्षता की कमी

फिल्म आर्थिक संकट के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलुओं को छूने से बचती हुई नजर आती है। इससे कहानी का संतुलन प्रभावित होता है।

औसत स्क्रीनप्ले

कहानी कई जगह अनुमानित लगती है और कुछ घटनाएं पहले से ही समझ में आने लगती हैं। इससे रोमांच कम हो जाता है।

धीमा पहला भाग

फिल्म का पहला हिस्सा अपेक्षाकृत धीमा है। हालांकि इंटरवल के बाद कहानी गति पकड़ती है और ज्यादा दिलचस्प बन जाती है।

सहायक किरदारों पर कम काम

फिल्म के कई सपोर्टिंग किरदार प्रभाव छोड़ने में असफल रहते हैं, जिससे कुछ सब-प्लॉट्स यादगार नहीं बन पाते।

कलाकारों का प्रदर्शन

मनोज बाजपेयी

मनोज बाजपेयी पूरी फिल्म की जान हैं। उन्होंने एक गंभीर और जिम्मेदार अधिकारी के किरदार को बेहद प्रभावी ढंग से निभाया है।

मधु शाह

लंबे समय बाद स्क्रीन पर नजर आईं मधु शाह अपनी भूमिका में सहज और प्रभावशाली लगी हैं।

अदा शर्मा

अदा शर्मा ने सीमित स्क्रीन टाइम में भी अच्छा प्रदर्शन किया है और अपने किरदार के साथ न्याय किया है।

अन्य कलाकार

नौशाद, राजीव गौर सिंह और बाकी कलाकारों ने भी अपनी-अपनी भूमिकाओं को संतुलित तरीके से निभाया है।

Disclaimer: यह लेख उपलब्ध जानकारी और फिल्म समीक्षा के आधार पर तैयार किया गया है। फिल्म से जुड़ी राय पूरी तरह समीक्षक के व्यक्तिगत विचार हैं। दर्शकों का अनुभव अलग हो सकता है।

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